दो कप चाय
दो कप चाय, जरूरी नही दिखावट और सुनने में अल्फाज दो के है तो यहां कोई महफिल ही होगी ।
कई दफा इंतजामात कुछ के करके जिया थोड़े मे ही जाता है।
ये थोड़ा असल में उस कुछ के इतमिनानो से कहीं ज्यादा होता है ,
पी करके कुछ एक प्यास मिटेगी इन इंतजामों का ऐसा इक इरादा होता है।
मेहफिले ये वैसी ही होती है जैसे रही होती है कई लोगो के साथ
बस मसला ये रहता है की यहां रहते है बस दो चाय और अनगिनत जज्बात ।
वो उठती हुई भाप कर रही होती है उन जज्बातों को थोड़ा सा ठंडा ,
जल्दी बयां कर दो कहीं गुजर न जाए ये कीमती लम्हा।
हम लोग भी इतने उलझे से होते है जो मिलता ही नही उस असल बिंदु को बनाकर एक सुलझी सी रेखा खींचने का रास्ता ,
बस उस चाय की गर्माहट संग डूबते रहते है अपने अंतरिम विचारों की गहराइयों से हुई मोह का ही रखके वास्ता ।
वो शब्दो की रवानियां चलती है...लेकिन आंखों ही आंखों में.
बूझो इन पहेलियों को और मुस्कुराहटों को चेहरे पर सजाकर बस गुजरने दो इन खूबसूरत से इंतजामों को।
#wordsplay
#Docupchai

0 Comments